पहला-पहला प्यार ठीक वैसा ही होता है, जिस तरह तपती धरती में पानी की शीतल बूँद। बात उन दिनों की हैं, जब मै हर साल की तरह गर्मियों की छुट्टियों में दादी के घर गई थी।सहेलियों के साथ समय मौज-मस्ती में बीत रहा था। एक दिन मैं अपनी सहेली के साथ छत पर खङी थी,तभी मेरी नजर नीचे एक छोटी सी दुकान पर गई,वहाँ 3-4 लड़के खड़े थे,और उन में से एक साँवले रंग का लड़का जिसके धुधराले बाल थे,और वो मुसकुराते हुए मेरी ओर ही देख रहा था, उसकी मुस्कुराहट भी गजब की थी दोनों गालों पर डिंपल पड रहे थें। मैं तो उसे देखती ही रह गई,और वो मुझे देख रहा था। उस लड़के के दोस्त हँसने लगे तो मैं शर्म से हुई लाल हो गई,और वहाँ से हट गई। मगर उसका चेहरे मेरे दिल में बस गया। अब तो मैं बहाने से कभी छत पर तो कभी आँगन में जाने लगी,कि वो फिर दिख जाए। सहेलियों से पता चला वो दिनभर अपनी दुकान पर रहता है। वो जब भी आता बाहर खड़े होकर मेरे घर की तरफ ही देखता रहता। धीरे-धीरे हम दोनों एक-दूसरे का इन्तजार करने लगे। मुझे उसे देखे बिना चैन ही नही मिलता था।हमारा आँखो ही आँखो वाला प्यार चल रहा था। न उसने कभी मुझसे बात...
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